Explainer: सीता के किरदार पर छिड़ती है बहस, रामायण में साई पल्लवी की कास्टिंग पर क्यों उठे सवाल?
'रामायण' में साई पल्लवी के सीता बनने को लेकर चर्चा के बीच एक बार फिर इस किरदार की कास्टिंग पर बहस छिड़ गई है. इससे पहले भी रामायण के में साईं पल्लवी की माता सीता के रूप में हुई कास्टिंग को लेकर सवाल उठे हैं. आइए, जानते हैं क्या है सीता के किरदार के लिए कास्टिंग में सवालों की वजह
देवी सीता का किरदार निभाने वाली एक्ट्रेस को भारत में सुंदरता की प्रचलित धारणाओं पर खरा न उतरने के कारण आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. जहां सोशल मीडिया एक तरह से जज और जूरी की भूमिका निभा रहा है. नितेश तिवारी की 'रामायण' में रणबीर कपूर (भगवान राम) के साथ साई पल्लवी (सीता) को कास्ट किए जाने के बाद एक नई बहस छिड़ गई है. लोग इस बात पर बंटे हुए हैं कि इस दिव्य जोड़ी को कैसा दिखना चाहिए. जहां कुछ लोगों ने सवाल उठाया है कि क्या पल्लवी का रंग-रूप, उनके घुंघराले बाल और नैन-नक्श 'सीता' की उनकी कल्पना से मेल खाते हैं. वहीं. कुछ अन्य लोग उनके लुक और अभिनय क्षमता के समर्थन में खड़े हैं. इस मतभेद के पीछे, जिसमें क्षेत्रीय पहलू भी जुड़ गए हैं. एक बड़ा सवाल छिपा है सीता की सुंदरता का यह आदर्श कहां से आया है और यह वाल्मीकि रामायण में वर्णित सीता के स्वरूप से कितना मेल खाता है?
एक यूजर ने साई पल्लवी को सीता का किरदार निभाने वाली 'सबसे बदसूरत' अभिनेत्री बताया और उनकी तुलना अशोक वाटिका की राक्षसियों से कर दी. यह वही जगह है, जहां रामायण में रावण ने माता सीता को कैद करके रखा था. एक अन्य यूजर ने उन्हें कास्ट किए जाने के कारण फिल्म के बहिष्कार की मांग की. फेसबुक पर लोगों ने उनके चेहरे के बालों को लेकर बारीकी से टिप्पणी की और उनके नैन-नक्श के बारे में अपमानजनक बातें कहीं. यहां तक कि एक यूजर ने तो लिंग-आधारित अपमानजनक टिप्पणी भी कर दी. ट्रोलिंग सिर्फ उनके रंग-रूप तक ही सीमित नहीं रही. इसमें उनके बाल, मेकअप, पहनावे और उनके पूरे लुक को भी निशाना बनाया गया. कुछ आलोचना तो स्टाइलिंग को लेकर है, लेकिन ज्यादातर बातें व्यक्तिगत हो गई हैं. लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या पल्लवी एक देवी का किरदार निभाने के लिए काफी सुंदर हैं?
हम किस सीता की तलाश कर रहे हैं?
कई दर्शकों के लिए पहला चेहरा कोई पेंटिंग नहीं, बल्कि टेलीविजन स्क्रीन है. 1987 में आया रामानंद सागर का मशहूर धारावाहिक 'रामायण', जिसमें अरुण गोविल ने राम और दीपिका चिखलिया ने सीता की भूमिका निभाई थी. आज भी लोगों के जहन में गहराई से बसा हुआ है. जयाप्रदा से लेकर नयनतारा और कृति सैनन तक, अब तक कई अन्य एक्ट्रेसेस ने भी अपने-अपने अंदाज में सीता का किरदार निभाया है. लेकिन उस ऐतिहासिक धारावाहिक के प्रभाव को कम करके नहीं आंका जा सकता. भारतीय सिनेमा में राम और सीता को अलग-अलग तरह से दिखाया गया है. दक्षिण भारत की कई फिल्मों में राम को नीले या गहरे रंग का और सीता को सांवले भारतीय रंग-रूप में दिखाया गया है. जबकि हिंदी सिनेमा में अक्सर इस दिव्य जोड़े को गोरे रंग, तीखे नैन-नक्श और एक आदर्श रूप में पेश किया गया है. ये कुछ सामान्य रुझान हैं, न कि उत्तर और दक्षिण के बीच कोई सख्त विभाजन. लेकिन पल्लवी की कास्टिंग को लेकर चल रही बहस को समझने के लिए ये एक उपयोगी संदर्भ देते हैं.
जब कोई छवि पीढ़ियों तक जानी-पहचानी बनी रहती है, तो वह एक मानक या पैमाना लगने लगती है. हिंदी भाषी क्षेत्र के कई दर्शकों के लिए दीपिका चिखलिया की 'सीता' एक रेफरेंस पॉइंट बनी हुई है. लेकिन 1987 का कोई चित्रण उसके बाद बनने वाले हर अडैप्टेशन के लिए कास्टिंग का आधार नहीं बन सकता. वरना, इस महाकाव्य को फिर से बनाने का क्या मतलब है? हम बस पुरानी सीरीज को दोबारा चला सकते थे और सबके कई हजार करोड़ रुपये बचा सकते थे. इन कास्ट को जिस तरह से देखा जाता है, उसमें एक दिलचस्प दोहरा मापदंड भी है. राम को 'नील मेघ श्याम' माना जाता है, जिसका मतलब अक्सर बारिश लाने वाले बादलों की तरह गहरे या नीले रंग से लगाया जाता है. फिर भी राम के गोरे रंग वाले कास्ट, जिनमें गोविल और अब रणबीर कपूर की कास्टिंग भी शामिल है. इन्हें कभी भी उनके रूप-रंग को लेकर वैसी आलोचना या जांच का सामना नहीं करना पड़ा.
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वहीं, 'आदिपुरुष' में सीता के किरदार के लिए कृति सेनन को चुने जाने पर उनके लुक को लेकर वैसी तीखी प्रतिक्रिया नहीं देखने को मिली. वहीं दूसरी ओर पल्लवी को व्यक्तिगत हमलों का सामना करना पड़ा है, जबकि कई दर्शक उनके इस रोल में चुने जाने का बचाव भी कर रहे हैं. पल्लवी की आलोचना करने वाले हर व्यक्ति के पीछे रंग-भेद या सुंदरता के तथाकथित मानक नहीं होते. इसलिए, उत्तर भारत के सभी दर्शकों को एक ही नजरिए से देखना गलत होगा. लेकिन, राम के मामले में उनके रंग को उनकी प्रमाणिकता की कसौटी नहीं माना जाता, जबकि सीता के रूप-रंग को लेकर यह बहस छिड़ जाती है कि क्या वे एक देवी का किरदार निभाने के लिए 'काफी सुंदर' हैं? यह फर्क दिव्यता और पारंपरिक सुंदरता के बीच के संबंध पर सवाल खड़े करता है. खासकर तब, जब वह पात्र एक स्त्री हो.
क्या कहती है वाल्मीकि रामायण?
जो लोग वाल्मीकि रामायण का हवाला देते हैं, वे सीता के सौंदर्य के काव्यात्मक वर्णन की ओर इशारा करते हैं. अरण्य कांड में रावण उन्हें पिघले हुए सोने जैसी चमक वाली, पीले रेशमी वस्त्र पहने हुए और फूलों से सजे कमल के समान बताता है. यह ग्रंथ साफ राउर से से उनके सौंदर्य का गुणगान करता है. लेकिन इसमें आज के दौर की किसी 'कास्टिंग' तस्वीर जैसा कास्ट नहीं मिलता, और न ही इसमें वह 'एयरब्रश' (संवारी हुई) दिखावट है जिसे कुछ लोग दिव्यता से जोड़कर देखते हैं.
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इसी तरह सोने जैसी चमक के वर्णन का मनमाना अर्थ निकालकर यह साबित करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए कि सीता का रंग-रूप विशेष प्रकार का ही रहा होगा. राम को भी काले बादलों और सांवले-नीले रंग से जोड़ा जाता है. अगर ग्रंथों के प्रति निष्ठा ही पैमाना है, तो यह बात दोनों पात्रों पर लागू होनी चाहिए, न कि केवल स्त्री के चेहरे पर.
फिल्म निर्माताओं ने कैलेंडर आर्ट, मंदिरों के चित्रण और पेंटिंग जैसी जानी-पहचानी छवियों का भी सहारा लिया है. असल बात यही है, हमारे दिमाग में मौजूद छवियों का एक इतिहास होता है, जिसे कलाकारों, टेलीविजन और सिनेमा ने आकार दिया है. समस्या तब शुरू होती है जब हम किसी एक जानी-पहचानी व्याख्या को ही एकमात्र सच मान लेते हैं.
उत्तर और दक्षिण भारत में खूबसूरती को देखने का अलग-अलग नजरिया
इसे उत्तर-दक्षिण विभाजन के नजरिए से देखना आसान लग सकता है, जहां ऐसा माना जाता है कि उत्तर भारतीय दर्शक गोरी और पारंपरिक रूप से सुंदर 'सीता' की छवि को पसंद करते हैं, जबकि दक्षिण भारतीय दर्शक प्राकृतिक सुंदरता और अभिनय कौशल को ज्यादा अहमियत देते हैं. लेकिन किसी भी क्षेत्र के सभी लोगों की राय एक जैसी नहीं होती. दक्षिण में भी ऐसे दर्शक हैं जो पल्लवी के लुक पर सवाल उठाते हैं, और उत्तर में ऐसे दर्शक हैं जो उनका बचाव करते हैं.
इसलिए यह फर्क दो क्षेत्रों के बीच सुंदरता को लेकर अलग-अलग विचारों का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि दर्शकों को किस तरह यह सिखाया गया है कि कुछ खास तरह के रूप ही 'आदर्श' होते हैं. पल्लवी ने 'फिदा', 'लव स्टोरी', 'श्याम सिंघा रॉय' और 'गार्गी' जैसी फिल्मों में अपनी एक्टिंग के दम पर अपना करियर बनाया है. जहां उनकी पॉपुलैरिटी पारंपरिक ग्लैमर पर निर्भर नहीं रही. उन्होंने मुहांसों (एक्ने) और सौंदर्य मानकों को लेकर अपने अनुभवों के बारे में भी बात की है और फेयरनेस क्रीम के विज्ञापनों में काम करने से इनकार कर दिया है. उनके समर्थकों के लिए उनकी बेहतरीन एक्टिंग क्षमता और स्क्रीन पर उनकी सहज उपस्थिति उन्हें 'सीता' के किरदार के लिए एक बेहतरीन विकल्प बनाती है.
यह आलोचना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि भारतीय सिनेमा ने दर्शकों की सोच को किस तरह ढाल दिया है, जिससे वे स्त्री सौंदर्य को गोरी त्वचा, सीधे बालों और तीखे नैन-नक्श से जोड़कर देखने लगे हैं. दशकों की फिल्मों और विज्ञापनों ने इन अपेक्षाओं को और गहरा कर दिया है. ये किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, और कोई भी फिल्म उद्योग इन पैमानों से अछूता नहीं है. पल्लवी को लेकर की गई हर आपत्ति इसी सोच से नहीं जुड़ी है. अगर किसी खराब डिजाइन वाली पोशाक पर सवाल उठाया जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह रंग-भेद से प्रेरित है.
लेकिन जब बातचीत बार-बार उनके रंग-रूप, बालों और कथित कमियों पर ही आकर टिक जाती है. तो इसमें सौंदर्य के तय पैमानों की भूमिका को अनदेखा करना मुश्किल हो जाता है. अगर किसी कलाकार को उसके स्वाभाविक रूप को अपनाने के लिए सराहा जाता है, तो फिर किसी पौराणिक किरदार को निभाने के लिए अचानक इतने संकुचित पैमानों की मांग क्यों की जाती है?
लुक की आलोचना करें, एक्टर की नहीं
इसका मतलब यह नहीं है कि फिल्म की समीक्षा नहीं की जा सकती. जब कोई फिल्म बड़े पैमाने, भव्यता और एक ऐसी कहानी को नए अंदाज में पेश करने का वादा करती है जिसे लाखों लोग पहले से ही अच्छी तरह जानते हैं. तो दर्शक निश्चित रूप से उसके हर पहलू को परखेंगे. कॉस्ट्यूम, गहने, हेयरस्टाइल, मेकअप और सिनेमैटोग्राफी इन सभी पर बात की जा सकती है. बड़ा बजट होने का मतलब यह नहीं है कि फिल्म का विज़ुअल पक्ष भी उतना ही प्रभावशाली होगा.
सच कहें तो, सीता के किरदार के लिए साई पल्लवी एक बेहतरीन चुनाव हैं, लेकिन प्रमोशनल तस्वीरों में उनकी स्टाइलिंग उनके साथ पूरा न्याय नहीं करती. गहने कुछ ज़्यादा ही लग रहे हैं, बालों के कर्ल्स बहुत ज्यादा सजे-धजे हैं. बाल, गहने और रंगों का मेल ऐसा लगता है जैसे लुक को जरूरत से ज्यादा सजाया गया हो. जबकि इसमें एक स्वाभाविक शालीनता होनी चाहिए थी. गरिमा और शांति से जुड़े इस किरदार के लिए थोड़ी सादगी और संयम बेहतर रहता.
अभिनेता ही कॉस्ट्यूम डिजाइनर, मेकअप आर्टिस्ट, सिनेमैटोग्राफर और निर्देशक सब कुछ एक साथ नहीं होता. अगर लुक विश्वसनीय नहीं लगता, तो इसके लिए सिर्फ उसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. अगर बात उनकी एक्टिंग की है, तो वह एक अलग विषय है, जिस पर फिल्म देखने के बाद ही सही ढंग से चर्चा की जा सकती है. इसी तरह पल्लवी का बचाव करने का मतलब यह नहीं है कि उसकी हर स्टाइलिंग पसंद को एकदम सही मान लिया जाए, या हर आपत्ति को उसकी पहचान पर हमला मान लिया जाए.
फिल्म निर्माताओं ने दर्शकों से कहा है कि वे कोई भी अंतिम राय बनाने से पहले फिल्म देख लें. यह बात समझ में भी आती है, क्योंकि प्रमोशनल तस्वीरों में तो बस तैयार फिल्म की एक झलक ही दिखती है. स्टाइलिंग पर आलोचना हो सकती है, ठीक वैसे ही जैसे कास्टिंग पर बहस हो सकती है.
सीता किसी एक चेहरे तक सीमित नहीं
रामायण इसलिए बची रही, क्योंकि इसे अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों और पीढ़ियों में कविता, नाटक, टेलीविजन, सिनेमा और मौखिक परंपराओं के जरिए बार-बार सुनाया गया है. हर रूपांतरण में कुछ चुनाव किए जाते हैं और हर पीढ़ी की अपनी उम्मीदें होती हैं. किसी महाकाव्य के प्रति श्रद्धा होने का मतलब यह नहीं है कि उसके सिनेमाई कास्टिंग की आलोचना नहीं की जा सकती.
लेकिन , अगर बहस इस बात पर है कि क्या पल्लवी ने सीता की गरिमा को पर्दे पर उतारा है. तो चर्चा एक्टिंग, लेखन और विजुअल ट्रीटमेंट पर होनी चाहिए. यह बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि क्या कोई एक्ट्रेस पारंपरिक रूप से इतनी सुंदर है कि वह इस किरदार के लायक हो. सीता को उनके साहस, दृढ़ विश्वास, गरिमा और सहनशक्ति के लिए पूजा जाता है, न कि किसी ऐसे 'चेहरे के टेस्ट' को पास करने के लिए, जिसका कोई तय पैमाना ही नहीं है.
शायद सबसे अहम सवाल यह नहीं है कि क्या साई पल्लवी वैसी दिखती हैं जैसी सीता को हम याद करते हैं, बल्कि यह है कि हम इतने पक्के तौर पर कैसे मान बैठे हैं कि फिल्म निर्माता केवल उसी सीता की कल्पना कर सकते हैं जिसे हम याद करते हैं? अगर स्टाइलिंग ठीक नहीं है, तो बेझिझक कहें. अगर कास्टिंग सही नहीं लग रही है, तो अपनी बात रखें. अगर फिल्म अपने किरदारों में जान नहीं फूंक पाती, तो निर्माताओं को जिम्मेदार ठहराएं. लेकिन इसके लिए किसी महिला के चेहरे को कटघरे में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए.