शरद पूर्णिमा पर निभाई जाती है 550 साल पुरानी 'बलि' परंपरा, जानिए क्या है इसकी मान्यता?
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में आज भी 500 से ज्यादा साल पुरानी परंपरा निभाई जाती है. इस परंपरा के दौरान बकरों की बलि दी जाती है. आइए इसके पीछे की कहानी के बारे में जानते हैं.
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसे देख हर किसी का दिल दहल जाएगा. यहां के लोग इस परंपरा को बड़े ही उत्साह के साथ निभाते हैं. शरद पूर्णिमा के दिन ऐतिहासिक कर्मागढ़ के मां मानकेश्वरी मंदिर में पारंपरिक बलि पूजा कार्यक्रम रखा गया. इस परंपरा को निभाने और देखने के लिए छत्तीसगढ़-ओडिशा की सीमा से सटे गांवों के हजारों श्रद्धालु पहुंचे थे.
मिली जानकारी के मुताबिक, मां मानकेश्वरी मंदिर में बलि पूजा के दौरान 100 से ज्यादा बकरों की बलि दी गई है. श्रद्धालुओं का मान्यता है कि मां मानकेश्वरी के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूरी होने पर भक्त अपनी श्रद्धा से बकरे की बलि अर्पित करने के लिए आते हैं.
कब से चली आ रही यह परंपरा?
देशभर में 9 नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है. इधर 15 दिन तक कर्मागढ़ में मां मानकेश्वरी की पूजा-अर्चना की जाती है. यह शक्ति उपासना का पर्व आश्विन प्रतिपदा से शुरू होकर शरद पूर्णिमा तक चलता है. यह परंपरा लगभग 550 साल पुरानी बताई जाती है. यहां की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि गोंडवाना परंपरा से जुड़े आयोजन में बलि को खास महत्व दिया जता है. कहा जाता है, कि मां के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना पूरी होने पर भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार बकरे की बलि अर्पित करते हैं.
कौन कराता है बलि अनुष्ठान?
स्थानीय लोगों का कहना है कि शरद पूर्णिमा के दिन मंदिर परिसर में पारंपरिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. यहां पर सुबह से ही श्रद्धालु कांसे के लोटे में दूध, सरई के पत्ते, सिंदूर, फूल-माला और नारियल लेकर मां मानकेश्वरी के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं. इसके बाद, गोंडवाना परंपरा के मुताबिक, बैगा समुदाय के लोग बलि अनुष्ठान संपन्न कराते हैं.
कब-कौन सा होता है अनुष्ठान?
इस दौरान बकरे की बलि की परंपरा श्रद्धालुओं के बीच आकर्षण और आस्था का केंद्र रहती है. स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, बलि देने के दौरान बैगा पर देवी की सवारी आने की भी मान्यता है. कुछ-कुछ मौकों पर बैगा द्वारा बलि दिए गए बकरे के खून को ग्रहण करने की भी परंपरा निभाई जाती है. बताया जाता है कि इसकी शुरुआत आश्विन प्रतिपदा को 'बूढा देव-राजाबल' की पूजा से होती है. इसके बाद महाष्टमी के दिन 'खाड़ाबल' और शरद पूर्णिमा पर मुख्य 'पुन्नीबल' अनुष्ठान होता है. इन सभी अनुष्ठानों के दौरान गोंडवाना संस्कृति और राजपरंपरा की झलक देखने को मिलती है.
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राज्यसभा सांसद भी पहुंचे थे
बताया जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन दोपहर के बाद राजपरिवार की शोभायात्रा ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ मंदिर पहुंचती है. इसके बाद माता का अभिषेक और पूजन कर परंपरागत अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं. इस मौके पर रायगढ़ राजपरिवार के सदस्य और राज्यसभा सांसद राजा देवेंद्र प्रताप सिंह भी परिवार समेत मां मानकेश्वरी की पूजा-अर्चना और पुन्नीबल अनुष्ठान में शामिल हुए. उनके साथ राजमाता स्नेहलता देवी, उनकी बहन उर्वशी देवी सिंह और परिवार के कई सदस्य मौजूद रहे.
लोगों को दी दशहरे की शुभकामनाएं
वहीं राज्यसभा सांसद राजा देवेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि कर्मागढ़ में आयोजित होने वाला यह पर्व आदिवासी समाज का पारंपरिक दशहरा है. उन्होंने बताया कि रायगढ़ में सामान्य दशहरा संपन्न होने के बाद शरद पूर्णिमा पर रियासतकाल से ही यहां पर खास तरीके से दशहरा उत्सव मनाया जाता रहा है. आगे उन्होंने कहा कि यह पूजा लगभग 400 से 500 सालों से भी ज्यादा पुरानी परंपरा है. इसका आयोजन पूर्वजों की सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहा है. इस दौरान उन्होंने क्षेत्र के लोगों को दशहरे की शुभकामनाएं दीं और मां मानकेश्वरी से सभी की सुख-समृद्धि और मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना की है.
(रिपोर्टः श्रीपाल यादव, रायगढ़)