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'UCC और सेक्युलरिज्म देखना हो तो बिहार जाइए', सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय करोल ने कही ये बात

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय करोल ने कहा कि UCC और सेक्युलरिज्म देखना हो, तो आपको बिहार जाना चाहिए, जहां छठ पूजा के दौरान अलग-अलग समुदायों और धर्मों के लोग एक साथ मिलकर पूजा करते हैं.

'UCC और सेक्युलरिज्म देखना हो तो बिहार जाइए', सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय करोल ने कही ये बात
Image Credit: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय करोल (ANI)

UCC (यूनिफॉर्म सिविल कोड) हमेशा ही चर्चा का विषय बना रहता है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय करोल का बयान भी सुर्खियों में आ गया है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल ने देश में UCC और संविधान के अनुच्छेद 44 को लेकर एक अहम बयान दिया है. उन्होंने देश में धर्मनिरपेक्षता (Secularism) की मिसाल देते हुए बिहार के लोकपर्व छठ पूजा का जिक्र किया है. 

बिहार में बिताए गए समय का जिक्र

एक कार्यक्रम के दौरान देश में धर्मनिरपेक्षता और समान नागरिक संहिता पर बात करते हुए जस्टिस संजय करोल ने कहा कि यदि किसी को यह देखना है कि वास्तविक धर्मनिरपेक्षता क्या होती है, तो उसे एक बार बिहार जाकर वहां की संस्कृति देखनी चाहिए. उन्होंने पटना HC के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर बिहार में बिताए समय का जिक्र कर कुछ अहम बातें कीं.

'बिहार जाकर देखिएगा'

उन्होंने कहा- सुप्रीम कोर्ट जमीनी हकीकत से जुड़ा हुआ था. मुझे, आप जानते हैं, इस देश की सेवा करने का सौभाग्य मिला है, चाहे वह नागरिक हों, निवासी हों और नागरिक, दोनों के लिए. आदिवासी क्षेत्रों में भी और गैर-आदिवासी क्षेत्रों में भी. उन क्षेत्रों में, उदाहरण के लिए, मैंने इस महान देश की सेवा बिहार से की. अगर आपको हकीकत में आर्टिकल 44 देखना है और हकीकत में सेक्युलरिज्म क्या होता है अगर आपको देखना है, तो आप बिहार जाकर देखिएगा.

उन्होंने कहा कि छठ आने वाला है, जो यहां बिहार से बैठे हैं, वे बताएंगे. पूरा का पूरा बिहार, वहां कोई मतभेद नहीं हैं. पूरा का पूरा बिहार, चाहे वह किसी भी समुदाय या धर्म से हो, एक साथ आते हैं और मिलकर पूजा या अन्य अनुष्ठान करते हैं और नदियों के तट पर जहां भी वे हैं, एक-दूसरे के साथ आदान-प्रदान करते हैं.  आपको जमीनी स्तर पर यह जरूर देखना चाहिए कि भारत के लोग वास्तव में क्या हैं, जैसा कि मैं हमेशा कहता हूं, वे वास्तव में संविधान को जीते हैं और हमें उनसे सीखना है. अब जहां तक आर्टिकल 44 का सवाल है, मेरा विचार मैं पहले ही व्यक्त कर चुका हूं कि हां, यह समय की मांग है. इसमें कोई संदेह नहीं है. चर्चा के लिए, बहस के लिए समय की मांग है, बात करेंगे, बात करके उसका कोई न कोई समाधान निकलेगा.

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About the Author

Ranjana Kumari

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रंजना कुमारी Zee Bihar Jharkhand की डिजिटल टीम में बतौर Sub-Editor अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं. बिहार के सिवान जिले के जीरादेई से ताल्लुक रखने वाली रंजना स्थानीय और जमीनी मुद्दों पर गहरी पकड़ रखती हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में वे मुख्य रूप से राजनीति, क्राइम, यूटिलिटी और देश-दुनिया की अहम रूटीन खबरों को प्रमुखता से कवर करती हैं. Zee Media का हिस्सा बनने से पहले रंजना ने न्यूज इंडिया 24x7 में भी डेढ़ साल तक अपनी सेवाएं दी थीं. एकेडमिक की बात करें तो रंजना GJU से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हैं.
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