क्या इतना आसान है अनंत सिंह की विधायकी का जाना? सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता से जानिए, 10वीं अनुसूची की गूढ़ बातें
मोकामा विधायक अनंत सिंह को जदयू ने पार्टी से बाहर कर दिया. साथ ही पार्टी ने बिहार विधानसभा के स्पीकर प्रेम कुमार को पत्र लिखकर अनंत सिंह की सदस्यता रद्द करने की मांग की है. अब सवाल उठता है क्या अनंत सिंह की विधायकी का जाना इतना आसान है?
जनता दल यूनाइटेड के नेता और मोकामा विधायक अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को पार्टी ने अनुशासनहीनता के आरोपों में 6 साल के लिए बाहर निकाल दिया है. इसके साथ ही बिहार विधानसभा के स्पीकर प्रेम कुमार को पत्र लिखकर मांग की गई है कि अनंत सिंह की सदस्यता रद्द कर दी जाए. इसके लिए पार्टी ने संविधान की 10वीं अनुसूची का हवाला दिया है. पार्टी से निष्कासित करना तो जनता दल यूनाइटेड का विशेषाधिकार है. अनुशासनहीनता के मामलों को आधार बनाकर कोई भी पार्टी अपने सदस्यों के खिलाफ ऐसी कार्रवाई कर सकती है, लेकिन किसी सदन की सदस्यता रहे या जाए, इसके लिए स्पीकर या चेयरमैन ही फैसला ले सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक जैन का मानना है कि स्पीकर को दी गई सिफारिश कानूनी रूप से गलत है, यदि इसे पद से स्वतः हटाने का आधार माना जाए. अध्यक्ष का अधिकार क्षेत्र तब शुरू होता है, जब संविधान की 10वीं अनुसूची के पैरा 6 के तहत उनके पास कोई याचिका आती है. पार्टी से निकाल देने भर से 10वीं अनुसूची (विश्वनाथन मामले के अनुसार) लागू नहीं हो जाती.
वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक जैन कहते हैं कि जनता दल यूनाइटेड के पास एक ही उचित रास्ता पैरा 2(1)(a) है, जिसके अनुसार यह साबित करना होगा कि सदस्य ने अपने आचरण से अपनी इच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ी है. इसमें तथ्यों की पड़ताल होगी. नोटिस और सुनवाई की जरूरत होगी. केवल पार्टी विरोधी बयान या ऐसा आचरण इसके दायरे में नहीं आता, उसे अयोग्यता का आधार नहीं बनाया जा सकता. अगर ऐसा हुआ तो 10वीं अनुसूची असहमति की आवाज को दबाने का हथियार बन जाएगी, जिसके खिलाफ 'किलोतो होलोहान' केस में चेताया गया था.
क्या था किहोतो होलोहान केस?
किहोतो होलोहान केस दलबदल विरोधी कानून और संविधान की 10वीं अनुसूची से जुड़ा ऐसा मामला है, जिसे मील का पत्थर माना जाता है. 1985 के 52वें संविधान संशोधन के जरिए जब 10वीं अनुसूची जोड़ी गई थी, जिसका मकसद दलबदल की प्रवृत्ति पर रोक लगाना था, की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. तब कोर्ट ने 10वीं अनुसूची की वैधता को बरकरार रखते हुए यह माना कि अनैतिक दलबदल रोकने के लिए यह जरूरी है. तब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि ऐसे मामलों में फैसला लेने का अधिकार स्पीकर के पास होगा, लेकिन उनके फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में होंगे. इसका मतलब यह हुआ कि स्पीकर के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी.
कौन से किहोतो होलोहान?
नगालैंड के राजनेता रहे किहोतो होलोहान लंबे समय तक विधायक रहे थे. 10वीं अनुसूची की वैधता को जब चुनौती दी गई थी, तब इस कानूनी विवाद में वे मुख्य याचिकाकर्ताओं में शामिल थे. 1992/1993 में इसी केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया था कि स्पीकर का फैसला न्यायिक समीक्षा से परे नहीं होगा.
क्या है विश्वनाथन केस?
वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक जैन के अनुसार, 24 जनवरी, 1996 को जी. विश्वनाथन बनाम माननीय अध्यक्ष, तमिलनाडु केस में (1996 AIR 1060, 1996 SCC (2) 353) सुप्रीम कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि किसी निर्वाचित सदस्य को उसकी पार्टी से निकाल भी दिया जाए, तो भी दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता के मामले में उसे उसी पार्टी का सदस्य माना जाएगा.
यदि ऐसा सदस्य किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाता है, तो यह माना जाएगा कि उसने स्वेच्छा से उस पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है, जिसके टिकट पर वह चुना गया था; और इस तरह वह अयोग्य हो जाएगा. इस मामले में हाई कोर्ट के फैसले और अध्यक्ष की ओर से दिए गए अयोग्यता के आदेश को बरकरार रखा गया था.
रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक जैन
एडवोकेट, फाउंडिंग पार्टनर
LL.M. कमिशन लॉ, P.U., LL.M. IEL, वारविक, U.K., PIL हार्वर्ड, USA
पूर्व एडिशनल AG, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
पूर्व सीनियर पैनल काउंसल, दिल्ली हाई कोर्ट
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